शुक्रवार 5 जून 2026 - 19:14
दुश्मन के हाइब्रिड वॉर का सामना करने के 6 उपायः आयतुल्लाह सईदी

क़ुम के इमाम जुमा ने कहा कि दुश्मन ने अपनी ताक़त दो महत्वपूर्ण और रणनीतिक बिंदुओं पर केंद्रित कर दी है। सर्वोच्च नेता ने इसका मुकाबला करने के लिए छह उपाय बताए हैं, जिन पर सभी को ध्यान देना चाहिए।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, क़ुम के इमाम जुमा ने कहा कि दुश्मन ने अपनी ताक़त दो महत्वपूर्ण और रणनीतिक बिंदुओं पर केंद्रित कर दी है। सर्वोच्च नेता ने इसका मुकाबला करने के लिए छह उपाय बताए हैं, जिन पर सभी को ध्यान देना चाहिए।

आयतुल्लाह सय्यद मुहम्मद सईदी ने कहा कि आयतुल्लाह सय्यद मुज्तबा खामेनेई ने इमाम ख़ुमैनी (र) की बरसी के मौके पर दिए गए संदेश में दुश्मन के हाइब्रिड युद्ध के रहस्य को स्पष्ट किया है। उन्होंने बताया कि दुश्मन दो संवेदनशील बिंदुओं अर्थात समाज की सहन शक्ति और अधिकारियो की सोच एंव निर्णय प्रणाली को निशाना बना रहा है:

पहला: समाज की सहनशक्ति 

इसका मतलब है समाज की वह क्षमता जो दबाव, आर्थिक संकट और धमकियों के बावजूद टिके रहने की ताकत रखती है। अगर लोग व्यवस्था से अलग हो जाएँ और उनका धैर्य टूट जाए तो देश की सबसे बड़ी सुरक्षा दीवार कमजोर हो जाती है।

दूसरा: अधिकारियों की सोच और निर्णय प्रणाली

इसका मतलब है कि जिम्मेदार लोग सही प्राथमिकताओं के साथ सही निर्णय लें। दुश्मन कोशिश करता है कि वे गलत फैसले लें—जैसे खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर देखना, अंदरूनी ताकत को कम समझना, जल्दबाज़ी में फैसले लेना या संकट में निष्क्रिय हो जाना।

उन्होंने कहा कि जब अधिकारी गलती करें तो सही काम नहीं हो पाता। सुप्रीम लीडर सय्यद मुज्तबा ख़ामेनेई ने दुश्मनों की चालों और बुरी साजिशों को निष्क्रिय करने के लिए प्रतिरोध, सही समझ और जागरूकता, देशी संस्थाओं का समन्वय, बाहरी खतरों के सामने मुस्लिम एकता, जनता और सरकार के बीच भरोसा, दुश्मन की बातों का समर्थन न करना जैसे छह उपाय प्रस्तुत किए।

उन्होंने आगे कहा कि ग़दीर सच्चाई और विलायत से वफादारी का नवीनीकरण है। ग़दीर केवल शिया समुदाय ही नहीं बल्कि पूरी मानवता और कमजोरों की सुरक्षा का प्रतीक है। जब पैग़म्बर (स) ने हज़रत अली (अ) का हाथ उठाया, तो इसका मतलब न्याय के लिए मजबूत नेतृत्व की घोषणा थी।

क़ुम के इमाम जुमा ने कहा कि आज इमाम-ए-ज़माना (अ) के साथ हमारी निष्ठा का मतलब है कि हम अपने समय के ताग़ूत का विरोध करते हैं और अपने धार्मिक नेतृत्व का पालन करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि 15 खुरदाद (15 जून आंदोलन) का अर्थ है कठिनाइयों से संघर्ष और राष्ट्रीय संकटों का समझदारी से प्रबंधन।

आयतुल्लाह सईदी ने शहीद आयतुल्लाह सईदी की शहादत की वर्षगांठ का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने शाह के शासनकाल में अकेले ही अमेरिकी निवेशकों के खिलाफ संघर्ष किया, जेल गए और यातनाओं के दौरान शहीद हो गए। उन्हें क़ुम के वादी-ए-सलाम में दफनाया गया। वे एक जागरूक और स्पष्ट दृष्टि वाले जिहादी थे। अमेरिकी निवेशकों के खिलाफ उनका संघर्ष एक रणनीतिक लड़ाई थी, और वास्तव में यह संघर्ष अमेरिका और उपनिवेशवाद की जड़ों के खिलाफ लड़ाई थी।

क़ुम के जुमे के इमाम ने आगे कहा कि शहीद आयतुल्लाह सईदी को इमाम ख़ुमैनी (र.ह.) का विशेष सम्मान और प्रेम प्राप्त था। उन्होंने एक बार शाह के शासन द्वारा हत्या की धमकी दिए जाने पर कहा था: “खुदा की क़सम, अगर तुम मुझे मार दोगे और मेरा खून ज़मीन पर गिराओगे, तो मेरे खून की हर बूंद से ख़ुमैनी का नाम निकलेगा।”

उन्होंने इमाम काज़िम के जन्म की बधाई देते हुए कहा कि “काज़िम” का अर्थ है ग़ुस्से को नियंत्रित करना और उसे सकारात्मक शक्ति में बदलना। कुरान में इसे परहेज़गारों की विशेषता बताया गया है। ग़ुस्से को रोककर उसे माफ़ी और भलाई में बदलना ही असली ताकत है। क़ुरआन की आयत का हवाला देते हुए बताया कि ग़ुस्से को दबाना कमज़ोरी नहीं बल्कि ईमान और परहेज़गारी की निशानी है। उन्होंने यह भी कहा कि आज समाज और नेतृत्व को ऐसे ही धैर्य और समझदारी की ज़रूरत है, ताकि संकट के समय सही फैसले लिए जा सकें और संयम बनाए रखा जा सके।

मुबाहिला के वाकये का ज़िक्र करते हुए उन्होंने बताया कि यह घटना पैग़म्बर (स.) और नज़रान के ईसाइयों के बीच सच्चाई को साबित करने के लिए हुई थी। इस मौके पर अहले-बैत (अ.) की मौजूदगी और उनकी महानता देखकर विरोधी पक्ष डर गया और मुकाबले से पीछे हट गया, हालांकि उन्होंने हठ के कारण इस्लाम को स्वीकार नहीं किया। 

आयतुल्लाह सईदी ने पर्यावरण दिवस को याद करते हुए कहा कि इस दिन को मनाने का उद्देश्य लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाना और समाज व सरकार दोनों को पर्यावरण विनाश रोकने के लिए जिम्मेदार फैसले लेने के लिए प्रेरित करना है।

उन्होंने खुत्बे में सूरह फ़तह की आयत 24 का उल्लेख करते हुए कहा कि यह आयत एक महत्वपूर्ण सैन्य और नैतिक मार्गदर्शन देती है, जिसमें बताया गया है कि अल्लाह ने हुदैबिया के मौके पर लड़ाई को टाल दिया और दोनों पक्षों के हाथ युद्ध से रोक दिए। उस समय मुसलमान कम संख्या में और बिना हथियार थे, जबकि दुश्मन पूरी ताकत में था, फिर भी अल्लाह की मदद से टकराव नहीं हुआ और बाद में यह घटना “स्पष्ट विजय” (फ़तह-ए-मुबीन) साबित हुई।

उन्होंने कहा कि इस घटना से यह संदेश मिलता है कि कभी-कभी बुद्धिमानी और संयम ही असली ताकत होते हैं, और बिना जरूरत युद्ध से बचना भी बड़ी जीत हो सकती है। मक्का जैसे पवित्र स्थान की गरिमा भी इसी वजह से सुरक्षित रही और आगे चलकर बिना खून-खराबे के विजय संभव हुई।

उन्होंने आगे कहा कि इस आयत का मुख्य संदेश है—ग़ुस्से पर नियंत्रण, भावनाओं पर बुद्धि की जीत और राजनीतिक-सैन्य समझदारी। आज के हालात में भी लोगों को भावनाओं में बहने के बजाय सोच-समझकर और संयम के साथ काम करना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि असली शक्ति युद्ध को टालने और बड़े लक्ष्यों को हासिल करने में होती है। दुश्मन भले ही युद्ध की धमकी दे रहा हो, लेकिन वह पूर्ण हमला करने की स्थिति में नहीं है, और यह भी अल्लाह की योजना और ईमान की ताकत का हिस्सा है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि युद्ध और शांति का सही फैसला केवल नेतृत्व और वली-ए-फ़क़ीह का अधिकार है। बिना अनुमति लिया गया कोई भी कदम गलत माना जाएगा, चाहे उसकी नीयत अच्छी ही क्यों न हो।

अंत में उन्होंने कहा कि हुदैबिया की घटना वास्तव में एक रणनीतिक संघर्ष था, जिसने अंततः इस्लाम की विजय सुनिश्चित की, और इसलिए इसे “ग़ज़वा-ए-हुदैबिया” भी कहा जाता है।

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